श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  5.133.30-31h 
निरमर्षं निरुत्साहं निर्वीर्यमरिनन्दनम्॥ ३०॥
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम्।
 
 
अनुवाद
संसार में किसी भी स्त्री को ऐसे पुत्र को जन्म नहीं देना चाहिए जो क्रोध, उत्साह, बल और पराक्रम से रहित हो तथा जो शत्रुओं का हर्ष बढ़ाने वाला हो ॥30 1/2॥
 
No woman in the world should give birth to a son who is devoid of resentment, enthusiasm, strength and valour and who increases the joy of the enemies. ॥ 30 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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