श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 26-28h
 
 
श्लोक  5.133.26-28h 
यमेनमभिनन्देयुरमित्रा: पुरुषं कृशम्॥ २६॥
लोकस्य समवज्ञातं निहीनासनवाससम्।
अहोलाभकरं हीनमल्पजीवनमल्पकम्॥ २७॥
नेदृशं बन्धुमासाद्य बान्धव: सुखमेधते।
 
 
अनुवाद
जो दुर्बल मनुष्य शत्रुओं द्वारा सत्कार पाता है, जिसका सभी लोग अपमान करते हैं, जिसका आसन और वस्त्र निकृष्ट कोटि के हैं, जो थोड़े से लाभ से संतुष्ट होकर आश्चर्य प्रकट करता है, जो सब प्रकार से हीन है, तुच्छ जीवन व्यतीत करता है और नीच स्वभाव का है, ऐसे मित्र को पाकर भी उसके भाई-बन्धु सुखी नहीं रहते।
 
A weak person who is felicitated by the enemy, who is insulted by all, whose seat and clothes are of inferior quality, who shows surprise after being satisfied with little gain, who is inferior in every way, leads a petty life and is of mean nature, his brothers and relatives are not happy after having such a friend. 26-27 1/2.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas