श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  5.133.25-26h 
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि॥ २५॥
नृशंस्यामयशस्यां च दु:खां कापुरुषोचिताम्।
 
 
अनुवाद
भिक्षावृत्ति आदि निन्दनीय व्यवसाय, जो नपुंसकों, कापालिकों, क्रूर लोगों और कायरों के लिए उपयुक्त है, उसे तुम्हें कभी नहीं अपनाना चाहिए; क्योंकि उससे अपयश फैलता है और दुःख होता है ॥25 1/2॥
 
You should never resort to the reprehensible profession of begging, etc., which is appropriate for eunuchs, Kapalikas, cruel people and cowards; because it spreads infamy and brings sorrow. ॥25 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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