श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.133.18 
उद्भावयस्व वीर्यं वा तां वा गच्छ ध्रुवां गतिम्।
धर्मं पुत्राग्रत: कृत्वा किंनिमित्तं हि जीवसि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
बेटा! धर्म को ध्यान में रखते हुए या तो अपना पराक्रम दिखाओ या उस गति को प्राप्त करो जो सब प्राणियों के लिए नियत है, अन्यथा तुम जीवित क्यों हो?
 
Son! Keeping Dharma in mind, either display your valour or attain that state which is destined for all beings, otherwise why are you living?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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