श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 131: भगवान‍् श्रीकृष्णका विश्वरूप दर्शन कराकर कौरवसभासे प्रस्थान  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.131.1-2 
वैशम्पायन उवाच
विदुरेणैवमुक्तस्तु केशव: शत्रुपूगहा।
दुर्योधनं धार्तराष्ट्रमभ्यभाषत वीर्यवान्॥ १॥
एकोऽहमिति यन्मोहान्मन्यसे मां सुयोधन।
परिभूय सुदुर्बुद्धे ग्रहीतुं मां चिकीर्षसि॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं: जनमेजय! विदुर की यह बात सुनकर शत्रु सेना का नाश करने वाले पराक्रमी श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से कहा, 'हे मूर्ख दुर्योधन! तू आसक्ति के कारण मुझे अकेला समझ रहा है और इसीलिए मेरा अपमान करके मुझे पकड़ने का प्रयत्न कर रहा है, यह तेरी अज्ञानता है।॥1-2॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Upon hearing Vidur say this, the powerful Krishna, the destroyer of the enemy forces, said to Dhritarashtra's son Duryodhan, 'You foolish Duryodhan! Due to your attachment, you consider me to be alone and therefore you are trying to capture me by insulting me, this is your ignorance. ॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)