न लोभादर्थसम्पत्तिर्नराणामिह दृश्यते।
तदलं तात लोभेन प्रशाम्य भरतर्षभ॥ ५४॥
अनुवाद
हे भरतपितामह! इस संसार में केवल लोभ से कोई धन प्राप्त नहीं कर सकता; अतः लोभ से कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला। आपको पाण्डवों के साथ संधि कर लेनी चाहिए।'
O great father of Bharata! In this world, nobody seems to be able to obtain wealth merely by being greedy; hence, nothing is going to be achieved by greed. You should make a treaty with the Pandavas.'
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गान्धारीवाक्ये एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १२९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२९॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥