श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 128: श्रीकृष्णका दुर्योधनको फटकारना और उसे कुपित होकर सभासे जाते देख उसे कैद करनेकी सलाह देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.128.6 
अक्षद्यूतं महाप्राज्ञ सतां मतिविनाशनम्।
असतां तत्र जायन्ते भेदाश्च व्यसनानि च॥ ६॥
 
 
अनुवाद
महामते! द्यूत-क्रीड़ा पुण्यात्माओं की भी बुद्धि का नाश कर देती है। और यदि दुष्ट मनुष्य इसमें लग जाएँ, तो उनमें बड़ा झगड़ा होता है और उन पर अनेक विपत्तियाँ आ पड़ती हैं॥6॥
 
Mahamate! The game of gambling destroys the wisdom of even the virtuous. And if wicked men indulge in it, there is a great quarrel among them and many calamities befall them.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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