श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 128: श्रीकृष्णका दुर्योधनको फटकारना और उसे कुपित होकर सभासे जाते देख उसे कैद करनेकी सलाह देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.128.31 
दुरात्मा राजपुत्रोऽयं धार्तराष्ट्रोऽनुपायकृत्।
मिथ्याभिमानी राज्यस्य क्रोधलोभवशानुग:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
राजा धृतराष्ट्र का यह दुष्ट पुत्र दुर्योधन अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए साधन के विरुद्ध आचरण करता है, क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर राजा होने का मिथ्या अभिमान करता है ॥31॥
 
This wicked son of King Dhritarashtra, Duryodhana, acts against the means to achieve his goal and is under the influence of anger and greed. He has false pride of being a king. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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