श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 128: श्रीकृष्णका दुर्योधनको फटकारना और उसे कुपित होकर सभासे जाते देख उसे कैद करनेकी सलाह देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.128.16 
एवंबुद्धि: पाण्डवेषु मिथ्यावृत्ति: सदा भवान्।
कथं ते नापराधोऽस्ति पाण्डवेषु महात्मसु॥ १६॥
 
 
अनुवाद
ऐसा विचार करके तुमने सदैव पाण्डवों के प्रति छलपूर्वक व्यवहार किया है, फिर यह कैसे माना जा सकता है कि तुमने महाबली पाण्डवों के प्रति कोई अपराध नहीं किया है?॥16॥
 
With such thoughts in mind you have always behaved deceitfully towards the Pandavas. Then how can it be believed that you have committed no crime against the great Pandavas?॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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