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श्लोक 5.127.21  |
अचिन्तयन् कंचिदन्यं यावज्जीवं तथाऽऽचरेत्।
एष धर्म: क्षत्रियाणां मतमेतच्च मे सदा॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| वह जीवन भर इसी प्रकार आचरण करे और किसी को कुछ न समझे; यही क्षत्रियों का कर्तव्य है और यही मेरा सदा का मत है॥ 21॥ |
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| He should behave in this manner all his life without considering anyone else as anything; this is the duty of the Kshatriyas and this is my opinion forever.॥ 21॥ |
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