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श्री महाभारत
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पर्व 5: उद्योग पर्व
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अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना
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श्लोक 24
श्लोक
5.124.24
यस्तु नि:श्रेयसं श्रुत्वा प्राक् तदेवाभिपद्यते।
आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते॥ २४॥
अनुवाद
जो मनुष्य अपने कल्याण की बात सुनकर अपना मत त्यागकर पहले उसे ग्रहण करता है, वह संसार में सुखपूर्वक उन्नति करता है॥ 24॥
The person who, upon hearing about his welfare, gives up his own opinion and accepts it first, prospers happily in the world.॥ 24॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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