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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.124.23 
यस्तु नि:श्रेयसं वाक्यं मोहान्न प्रतिपद्यते।
स दीर्घसूत्रो हीनार्थ: पश्चात्तापेन युज्यते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य आसक्ति के कारण अपने हित की बात नहीं सुनता, वह स्वार्थ से भ्रष्ट होकर अन्त में केवल पश्चाताप ही पाता है। 23.
 
The man who, due to attachment, does not listen to what is in his own interest, being corrupted by his own selfishness, ends up only with remorse. 23.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)