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mahabharat 5.121.11-12h: उनके यज्ञ का धुआँ स्वर्ग के द्वार के समान प्रतीत हो रहा था। उसे सूंघकर ययाति पृथ्वी की ओर गिर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 5.121: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 121: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  5.121.11-12h 
तेषामध्वरजं धूमं स्वर्गद्वारमुपस्थितम्॥ ११॥
ययातिरुपजिघ्रन् वै निपपात महीं प्रति।
 
 
अनुवाद
उनके यज्ञ का धुआँ स्वर्ग के द्वार के समान प्रतीत हो रहा था। उसे सूंघकर ययाति पृथ्वी की ओर गिर रहे थे।
 
The smoke of their yajna appeared as the gate of heaven. Smelling it, Yayati was falling towards the earth. 11 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)