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mahabharat 5.120.8-11: इसी क्रम में वैदूर्यमणि के अंकुरों के समान सुन्दर माधवी कोमल, चिकनी, कड़वी, मीठी और हरी घास चरती, पवित्र नदियों का शुद्ध, शीतल, स्वच्छ और सुस्वादु जल पीती तथा व्याघ्रों से रहित और अग्नि से रहित मृगों से युक्त निर्जन वन में मृगों के साथ मृग के समान विचरण करती थी। उसने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए महान धर्म का पालन किया। 8-11॥   |   mahabharat अध्याय 5.120: माधवीका वनमें जाकर तप करना तथा ययातिका स्वर्गमें जाकर सुखभोगके पश्चात् मोहवश तेजोहीन होना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 120: माधवीका वनमें जाकर तप करना तथा ययातिका स्वर्गमें जाकर सुखभोगके पश्चात् मोहवश तेजोहीन होना  »  श्लोक 8-11
 
 
श्लोक  5.120.8-11 
वैदूर्याङ्कुरकल्पानि मृदूनि हरितानि च।
चरन्तीश्लक्ष्णशष्पाणि तिक्तानि मधुराणि च॥ ८॥
स्रवन्तीनां च पुण्यानां सुरसानि शुचीनि च।
पिबन्ती वारिमुख्यानि शीतानि विमलानि च॥ ९॥
वनेषु मृगवासेषु व्याघ्रविप्रोषितेषु च।
दावाग्निविप्रयुक्तेषु शून्येषु गहनेषु च॥ १०॥
चरन्ती हरिणै: सार्धं मृगीव वनचारिणी।
चचार विपुलं धर्मं ब्रह्मचर्येण संवृतम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इसी क्रम में वैदूर्यमणि के अंकुरों के समान सुन्दर माधवी कोमल, चिकनी, कड़वी, मीठी और हरी घास चरती, पवित्र नदियों का शुद्ध, शीतल, स्वच्छ और सुस्वादु जल पीती तथा व्याघ्रों से रहित और अग्नि से रहित मृगों से युक्त निर्जन वन में मृगों के साथ मृग के समान विचरण करती थी। उसने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए महान धर्म का पालन किया। 8-11॥
 
In this sequence, Madhavi, beautiful like the shoots of Vaidurya Mani, used to graze on soft, smooth, bitter, sweet and green grass, drink pure, cool, clear and tasty water of holy rivers and used to roam like a female deer along with the deer in the deserted forests inhabited by deer, devoid of tigers and without fire. He practiced great religion by following celibacy. 8-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)