श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 12: देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.12.3 
जहि क्रोधमिमं साधो न कुप्यन्ति भवद्विधा:।
परस्य पत्नी सा देवी प्रसीदस्व सुरेश्वर॥ ३॥
 
 
अनुवाद
साधु! आपको यह क्रोध त्याग देना चाहिए। आप जैसे महापुरुष दूसरों पर क्रोध नहीं करते। अतः प्रसन्न रहें। सुरेश्वर! शची देवी दूसरे इंद्र की पत्नी हैं।
 
Sadhu! You should give up this anger. A great person like you does not get angry with others. So be happy. Sureshwar! Sachi Devi is the wife of the second Indra.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)