श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 115: राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  5.115.20-21 
तमुपागम्य विप्र: स हर्यश्वं गालवोऽब्रवीत्।
कन्येयं मम राजेन्द्र प्रसवै: कुलवर्धिनी॥ २०॥
इयं शुल्केन भार्यार्थं हर्यश्व प्रतिगृह्यताम्।
शुल्कं ते कीर्तयिष्यामि तच्छ्रुत्वा सम्प्रधार्यताम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण गालव ने राजा हर्यश्व के पास जाकर कहा- 'राजन्! मेरी यह कन्या अपनी सन्तानों के द्वारा वंश की वृद्धि करने वाली है। आप शुल्क देकर इसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। हर्यश्व! मैं पहले आपको शुल्क बताता हूँ। उसे सुनकर आप अपना कर्तव्य निश्चित करें।'॥ 20-21॥
 
Brahmin Galav went to King Haryashva and said- 'King! This daughter of mine is going to increase the dynasty through her children. You accept her as your wife by paying the fee. Haryashva! I will tell you the fee first. After listening to it, you should decide your duty.'॥ 20-21॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते पञ्चदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)