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श्लोक 5.107.4  |
कुतो मे भोजने श्रद्धा सुखश्रद्धा कुतश्च मे।
श्रद्धा मे जीवितस्यापि छिन्ना किं जीवितेन मे॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसी दशा में मुझे भोजन में रुचि कैसे हो सकती है? भोगों की इच्छा कैसे हो सकती है? और मुझे इस जीवन की क्या आवश्यकता है? इस जीवन को धारण करने का जो उत्साह मुझमें था, वह भी लुप्त हो गया है॥4॥ |
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| ‘In such a condition how can I have any interest in food? How can I have any desire to enjoy pleasures? And what do I need this life for? The enthusiasm I had to preserve this life has also vanished.॥ 4॥ |
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