श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.105.7 
सोऽहं प्राणान् विमोक्ष्यामि तथा परिजनो मम।
ये च भृत्या मम गृहे प्रीतिमान् भव वासव॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वासव! अब मैं प्राण त्याग दूँगा। मेरे परिवार और मेरे घर के जो प्राणी भोजन के योग्य हैं, वे भी भोजन के अभाव में मर जाएँगे। अब तुम ही संतुष्ट रहो ॥7॥
 
Vasava! Now I will give up my life. The creatures in my family and in my house who are capable of being fed will also die due to lack of food. Now you alone should be satisfied. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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