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श्लोक 5.105.40  |
यथैवेश्वरसृष्टोऽस्मि यद् भावि या च मे गति:।
तथा महर्षे वर्तामि किं प्रलाप: करिष्यति॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| महर्षि! जिस भगवान ने मुझे बनाया है, उसी के अनुसार मैं आचरण करता हूँ, चाहे मेरा भविष्य और मेरी स्थिति कुछ भी हो। आपकी इस मूर्खता से क्या होगा?॥40॥ |
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| ‘Maharishi! I behave according to the God who has made me, whatever my future and my condition is. What will this nonsense of yours do?’॥ 40॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे पञ्चाधिकशततमोऽध्याय:॥ १०५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०५॥
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