श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  5.105.39 
कदर्थीकृत्य तद् वाक्यमृषे: कण्वस्य दुर्मति:।
ऊरुं गजकराकारं ताडयन्निदमब्रवीत्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
उस मूर्ख पुरुष ने कण्व ऋषि के वचनों की उपेक्षा करके अपनी मोटी जांघ को, जो हाथी की सूँड़ के समान ऊपर-नीचे होती थी, पटककर इस प्रकार कहा -॥39॥
 
That foolish man, disregarding the words of the sage Kanva, beat his thick thigh, which had ups and downs like the trunk of an elephant, and said thus -॥ 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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