श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.105.35 
विष्णुर्वायुश्च शक्रश्च धर्मस्तौ चाश्विनावुभौ।
एते देवास्त्वया केन हेतुना वीक्षितुं क्षमा:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
धर्मस्वरूप भगवान विष्णु, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार - ये कितने ही देवता तुम्हारे विरुद्ध हैं। तुम इन देवताओं की ओर दृष्टि डालने का साहस क्यों करते हो?॥ 35॥
 
Vishnu, the embodiment of Dharma, Vayu, Indra and the two Ashwinikumars - so many gods are against you. Why do you dare to even look at these gods?॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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