श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.105.31 
पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप सुमुखं गरुडोरसि।
तत:प्रभृति राजेन्द्र सह सर्पेण वर्तते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! तत्पश्चात भगवान ने अपने पैर के अँगूठे से सुमुख सर्प को उठाकर गरुड़ की छाती पर रख दिया। तब से गरुड़ उस सर्प को सदैव अपने साथ रखते हैं।
 
Rajendra! Thereafter the Lord picked up the Sumukh serpent with his toe and placed it on Garuda's chest. Since then Garuda always carries that serpent with him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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