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श्लोक 5.105.31  |
पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप सुमुखं गरुडोरसि।
तत:प्रभृति राजेन्द्र सह सर्पेण वर्तते॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| राजेन्द्र! तत्पश्चात भगवान ने अपने पैर के अँगूठे से सुमुख सर्प को उठाकर गरुड़ की छाती पर रख दिया। तब से गरुड़ उस सर्प को सदैव अपने साथ रखते हैं। |
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| Rajendra! Thereafter the Lord picked up the Sumukh serpent with his toe and placed it on Garuda's chest. Since then Garuda always carries that serpent with him. |
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