|
| |
| |
श्लोक 5.105.3  |
गरुड उवाच
भगवन् किमवज्ञानाद् वृत्ति: प्रतिहता मम।
कामकारवरं दत्त्वा पुनश्चलितवानसि॥ ३॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| गरुड़ बोले - हे प्रभु ! आपने मेरी उपेक्षा करके मेरी जीविका में बाधा क्यों डाली है ? मुझे इच्छानुसार कार्य करने का वरदान देकर आप पुनः उससे विमुख क्यों हो गए हैं ?॥3॥ |
| |
| Garuda said - O Lord! Why have you hindered my livelihood by ignoring me? After giving me the boon to do whatever I want, why have you again become distracted from it?॥ 3॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|