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mahabharat 5.105.28: हे प्रभु! मैं आपके ध्वज में रहने वाला एक साधारण पक्षी हूँ। इस समय आपके तेज और बल से व्याकुल और अचेत हूँ। कृपया मेरा अपराध क्षमा करें॥ 28॥   |   mahabharat अध्याय 5.105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.105.28 
क्षन्तुमर्हसि मे देव विह्वलस्याल्पचेतस:।
बलदाहविदग्धस्य पक्षिणो ध्वजवासिन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मैं आपके ध्वज में रहने वाला एक साधारण पक्षी हूँ। इस समय आपके तेज और बल से व्याकुल और अचेत हूँ। कृपया मेरा अपराध क्षमा करें॥ 28॥
 
O Lord! I am an ordinary bird living in your flag. At this moment, I am distraught and unconscious due to your strength and brilliance. Please forgive my crime.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)