श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.105.25 
व्यात्तास्य: स्रस्तकायश्च विचेता विह्वल: खग:।
मुमोच पत्राणि तदा गुरुभारप्रपीडित:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
गरुड़ ने भारी भार से अत्यन्त व्याकुल होकर अपना मुख खोल दिया। उनका सारा शरीर दुर्बल हो गया। उन्होंने अचेत होकर व्याकुल होकर अपने पंख छोड़ दिए॥ 25॥
 
Garuda, greatly troubled by the great weight, opened his mouth. His whole body became weak. He, unconscious and distraught, let go of his wings.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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