श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  5.105.18-19 
कण्व उवाच
स तस्य वचनं श्रुत्वा खगस्योदर्कदारुणम्।
अक्षोभ्यं क्षोभयंस्तार्क्ष्यमुवाच रथचक्रभृत्॥ १८॥
गरुत्मन् मन्यसेऽऽत्मानं बलवन्तं सुदुर्बलम्।
अलमस्मत्समक्षं ते स्तोतुमात्मानमण्डज॥ १९॥
 
 
अनुवाद
कण्व मुनि कहते हैं - राजन! गरुड़ के ये वचन भयंकर परिणाम देने वाले थे। उन्हें सुनकर रथांगपाणि श्री विष्णु ने पक्षीराज गरुड़ को, जो किसी पर क्रोध नहीं करते थे, क्रोधित करके कहा - 'गरुड़मान! तुम अत्यन्त दुर्बल हो, परन्तु अपने को बहुत बलवान समझते हो। अण्डे! मेरे सामने फिर कभी अपनी प्रशंसा मत करना।' 18-19॥
 
Kanva Muni says – King! These words of Garud were going to have dire consequences. Hearing them, Rathangapani Shri Vishnu angered the king of birds who was not angry with anyone and said - 'Garutman! You are very weak, but you consider yourself very strong. Egg! Never praise yourself in front of me again. 18-19॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd