श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.105.17 
सोऽहं पक्षैकदेशेन वहामि त्वां गतक्लम:।
विमृश त्वं शनैस्तात को न्वत्र बलवानिति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! मैं आपको बिना थके अपने पंखों पर उठाये रहता हूँ। आप धीरे-धीरे सोचें कि यहाँ सबसे बलवान कौन है?॥17॥
 
Father! I carry you on my wings without any fatigue. You should think slowly who is the strongest here?॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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