श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.105.12 
श्रुतश्री: श्रुतसेनश्च विवस्वान् रोचनामुख:।
प्रसृत: कालकाक्षश्च मयापि दितिजा हता:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मैंने श्रुतश्री, श्रुतसेन, विवस्वान, रोचन्मुख, प्रश्रित और कालकाक्ष नामक राक्षसों का भी वध किया है। 12॥
 
I have also killed the demons named Shrutashree, Shrutsen, Vivasvan, Rochanmukh, Prasrit and Kaalkaksh. 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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