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श्लोक 5.103.22  |
कण्व उवाच
मातलिं प्रीतमनसं दृष्ट्वा सुमुखदर्शनात्।
निवेदयामास तदा माहात्म्यं जन्म कर्म च॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| कण्व मुनि कहते हैं - राजन ! सुमुख के दर्शन से मातलि को प्रसन्न देखकर नारदजी उस समय उस सर्प के जन्म, कर्म और माहात्म्य का वर्णन करने लगे ॥22॥ |
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| Kanva Muni says – King! Seeing Matali happy with the sight of Sumukh, Naradji at that time started narrating the birth, deeds and importance of that serpent. 22॥ |
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