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श्लोक 5.103.20  |
क: पिता जननी चास्य कतमस्यैष भोगिन:।
वंशस्य कस्यैष महान् केतुभूत इव स्थित:॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| इसके माता-पिता कौन हैं? यह किस सर्प का पौत्र है और किसके वंश की महान् ध्वजा को सुशोभित कर रहा है?॥20॥ |
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| Who are its parents? Which snake's grandson is it and whose dynasty's great flag is it adorning?॥ 20॥ |
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