vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 5: उद्योग पर्व
»
अध्याय 10: इन्द्रसहित देवताओंका भगवान् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना
»
श्लोक 33
श्लोक
5.10.33
छिद्रान्वेषी समुद्विग्न: सदा वसति देवराट्।
स कदाचित् समुद्रान्ते समपश्यन्महासुरम्॥ ३३॥
अनुवाद
देवराज इंद्र सदैव वृत्रासुर को मारने का अवसर ढूँढ़ते रहते थे। एक दिन उन्होंने समुद्र तट पर उस महादैत्य को देखा।
Devraj Indra was always anxious looking for a loophole (an opportunity to kill Vritraasura). One day he saw that great demon on the seashore.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×