श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 10: इन्द्रसहित देवताओंका भगवान‍् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.10.32 
युक्त: सदाभवच्चापि शक्रो हर्षसमन्वित:।
वृत्रस्य वधसंयुक्तानुपायानन्वचिन्तयत्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र भी प्रसन्नता से भर गये और उससे नियमित रूप से मिलने लगे, किन्तु वे सदैव वृत्र को मारने के उपायों के बारे में सोचते रहते थे।
 
Indra too was filled with joy and started meeting him regularly, but he always kept thinking about the ways to kill Vritra.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)