श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 10: इन्द्रसहित देवताओंका भगवान‍् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.10.23 
ऋषय ऊचु:
सकृत् सतां संगतं लिप्सितव्यं
तत: परं भविता भव्यमेव।
नातिक्रामेत् सत्पुरुषेण संगतं
तस्मात् सतां संगतं लिप्सितव्यम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले - मनुष्य को संतों के संग की अवश्य इच्छा करनी चाहिए। संतों का संग प्राप्त होने पर परम कल्याण ही प्राप्त होता है। संतों के संग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अतः मनुष्य को संतों के संग की अवश्य इच्छा करनी चाहिए।॥23॥
 
The sage said - One should definitely desire the company of saints. On attaining the company of saints, it will only lead to supreme welfare. The company of saints should not be ignored. Hence one should definitely desire the company of saints.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)