श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 10: इन्द्रसहित देवताओंका भगवान‍् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.10.17 
ऋषयोऽथ ततोऽभ्येत्य वृत्रमूचु: प्रियं वच:।
व्याप्तं जगदिदं सर्वं तेजसा तव दुर्जय॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उस समय ऋषियों ने वृत्रासुर के पास आकर उससे ये मधुर वचन कहे - 'दुर्जय वीर! यह सम्पूर्ण जगत् तुम्हारे तेज से व्याप्त है॥ 17॥
 
At that time the sages came to Vritraasura and said these sweet words to him - 'Durjaya Veer! This entire universe is pervaded by your brilliance.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)