श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 1: राजा विराटकी सभामें भगवान‍् श्रीकृष्णका भाषण  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.1.24 
अज्ञायमाने च मते परस्य
किं स्यात् समारभ्यतमं मतं व:।
तस्मादितो गच्छतु धर्मशील:
शुचि: कुलीन: पुरुषोऽप्रमत्त:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
शत्रु के मन की बात जाने बिना आप कोई ऐसा निर्णय कैसे कर सकते हैं जिसे निश्चित रूप से कार्यान्वित किया जा सके? अतः मैं सोचता हूँ कि यहाँ से कोई धार्मिक, धर्मपरायण, कुलीन और सतर्क पुरुष दूत बनकर वहाँ जाए॥ 24॥
 
Without knowing the enemy's thoughts, how can you make any decision which can certainly be put into action? Therefore, I think that some religious, pious, noble and cautious man should go there as a messenger from here.॥ 24॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas