श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 1: राजा विराटकी सभामें भगवान‍् श्रीकृष्णका भाषण  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.1.11 
शक्तैर्विजेतुं तरसा महीं च
सत्ये स्थितै: सत्यरथैर्यथावत्।
पाण्डो: सुतैस्तद् व्रतमुग्ररूपं
वर्षाणि षट् सप्त च चीर्णमग्रॺै:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
पाण्डव सदैव सत्य पर अडिग रहते हैं। सत्य ही उनका रथ (आश्रय) है। वे शीघ्रता से सम्पूर्ण जगत को जीतने की शक्ति रखते हैं। किन्तु इन त्यागी पाण्डुपुत्रों ने सत्य को ध्यान में रखकर धैर्यपूर्वक तेरह वर्षों तक वनवास और अज्ञातवास का कठोर व्रत धारण किया है, जो अत्यंत भयंकर है। ॥11॥
 
The Pandavas always remain steadfast in truth. Truth is their chariot (shelter). They have the power to conquer the entire world with speed. However, these renunciant sons of Pandu, keeping truth in mind, have patiently followed the tough vow of living in exile and incognito for thirteen years, which is very fierce in nature. ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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