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श्लोक 4.9.4-5  |
सा तानुवाच राजेन्द्र सैरन्ध्रॺहमिहागता॥ ४॥
कर्म चेच्छामि वै कर्तुं तस्य यो मां युयुक्षति।
तस्या रूपेण वेषेण श्लक्ष्णया च तथा गिरा।
न श्रद्दधत तां दासीमन्नहेतोरुपस्थिताम्॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! उनके इस प्रकार पूछने पर द्रौपदी ने बताया - ‘मैं सैरन्ध्री हूँ। जो मुझे अपने यहाँ नौकरी पर रखना चाहता है, उसके घर में मैं सैरन्ध्री बनकर काम करना चाहती हूँ और इसीलिए यहाँ आई हूँ।’ उसके रूप, वेश और मधुर वाणी से किसी को विश्वास नहीं हुआ कि वह दासी है और यहाँ भोजन-वस्त्र के लिए आई है।॥4-5॥ |
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| King! On his asking in this manner, Draupadi told him- 'I am Sairandhri*. I want to work as a Sairandhri in the house of the one who wishes to employ me at his place and that is why I have come here.' Her beauty, attire and sweet voice made no one believe that she is a maid and has come here for food and clothes. ॥ 4-5॥ |
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