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श्लोक 4.8.13  |
वैशम्पायन उवाच
तथा स भीमो विहितो महानसे
विराटराज्ञो दयितोऽभवद् दृढम्।
उवास राज्ये न च तं पृथग् जनो
बुबोध तत्रानुचराश्च केचन॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! इस प्रकार भीमसेन रसोईघर में नियुक्त होकर राजा विराट के अत्यंत प्रिय व्यक्ति बन गए । उस राज्य में कोई भी उनका रहस्य नहीं जानता था और उस रसोईघर का कोई भी सेवक उन्हें पहचान नहीं सकता था ॥13॥ |
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| Vaishampayana says- Janamejaya! Thus Bhimsena was employed in the kitchen and became a very favourite person of King Virat. No person in that kingdom knew his secret and no servant of that kitchen could recognize him.॥ 13॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि भीमप्रवेशे अष्टमोऽध्याय:॥ ८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें भीमप्रवेशसम्बन्धी आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८॥
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