श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 72: अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.72.5 
तस्मान्निमन्त्रयेऽहं ते दुहितां मनुजाधिप।
शुद्धो जितेन्द्रियो दान्तस्तस्या: शुद्धि: कृता मया॥ ५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस संशय के निवारण के लिए मैं आपकी पुत्री को अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करूँगा। तभी मैं शुद्ध चरित्र वाली, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाली तथा अपने मन को वश में रखने वाली मानी जाऊँगा और इस प्रकार आपकी पुत्री के चरित्र की पवित्रता मेरे द्वारा स्पष्ट हो जाएगी।
 
Maharaj! To avoid that doubt, I will accept your daughter as my daughter-in-law. Only then will I be considered to be of pure character, one who has controlled his senses and has controlled his mind and in this way the purity of your daughter's character will become clear through me. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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