श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 72: अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  4.72.39-40 
गोसहस्राणि रत्नानि वस्त्राणि विविधानि च।
भूषणानि च मुख्यानि यानानि शयनानि च॥ ३९॥
भोजनानि च हृद्यानि पानानि विविधानि च।
तन्महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनायुतम्।
नगरं मत्स्यराजस्य शुशुभे भरतर्षभ॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हजारों गौएँ, रत्न, नाना प्रकार के वस्त्र, आभूषण, प्रमुख वाहन, शय्या, भोजन सामग्री तथा नाना प्रकार के उत्तम पेय पदार्थ भी अर्पित किए गए। जनमेजय! उस समय हजारों-लाखों स्वस्थ मनुष्यों से युक्त मत्स्यराज का नगर मूर्तियों के उत्सव के समान सुशोभित हो रहा था। 39-40॥
 
Thousands of cows, gems, various types of clothes, jewellery, main vehicles, bedding, food items and various kinds of good drinkable items were also offered. Janamejaya! At that time, the city of Matsyaraj, filled with thousands and lakhs of healthy people, was getting decorated like a festival of idols. 39-40॥
 
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रॺां संहितायां वैयासिक्यां विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि उत्तराविवाहे द्विसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७२॥
इस प्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारत नामक एक लाख श्लोकोंकी संहितामें विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें उत्तराविवाहविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७२॥

विराटपर्वकी श्लोक-संख्या अनुष्टुप् छन्द (अन्य बड़े छन्द) बड़े छन्दोंका ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर कुल योग उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— २१२५–(१९८)–२८३॥ –२४०८॥ दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— २४९–(२२॥ )–३३॥ –२८२॥ विराटपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक-संख्या—२६९१
 
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