श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 72: अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  4.72.2-3 
अर्जुन उवाच
अन्त:पुरेऽहमुषित: सदा पश्यन् सुतां तव।
रहस्यं च प्रकाशं च विश्वस्ता पितृवन्मयि॥ २॥
प्रियो बहुतमश्चासं नर्तको गीतकोविद:।
आचार्यवच्च मां नित्यं मन्यते दुहिता तव॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन बोले- हे राजन! मैं बहुत समय तक आपके महल में रहा हूँ और आपकी पुत्री को एकान्त में तथा सबके सामने (पुत्री के रूप में) देखा है। उसने भी मुझ पर पिता के समान विश्वास किया है। मैं नर्तक था और गायन में भी निपुण हूँ, इसलिए वह मुझ पर बहुत स्नेह करती है, किन्तु आपकी पुत्री ने सदैव मुझे आचार्य (गुरु) के समान ही माना है॥ 2-3॥
 
Arjun said- O King! I have lived in your palace for a long time and have seen your daughter both in private and in public (as a daughter). She too has trusted me like a father. I was a dancer and I am also skilled in singing, so she has a lot of love for me, but your daughter has always treated me like an Acharya (Guru).॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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