श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 72: अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.72.1 
विराट उवाच
किमर्थं पाण्डवश्रेष्ठ भार्यां दुहितरं मम।
प्रतिग्रहीतुं नेमां त्वं मया दत्तामिहेच्छसि॥ १॥
 
 
अनुवाद
विराट बोले—हे पाण्डवश्रेष्ठ! मैं स्वयं तुम्हें अपनी कन्या दे रहा हूँ, फिर तुम उसे पत्नी रूप में क्यों नहीं स्वीकार करते?॥1॥
 
Virat said—O great Pandava! I myself am giving you my daughter, then why don't you accept her as your wife?॥ 1॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas