राजा विराट की यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने कुन्तीपुत्र अर्जुन की ओर देखा। अपने भाई को देखकर अर्जुन ने मत्स्यराज से इस प्रकार कहा - 'हे राजन! मैं आपकी पुत्री को अपने पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करता हूँ। मत्स्य और भरत कुल का यह सम्बन्ध सर्वथा उचित है।' ॥35-36॥
On hearing this from King Virat, Dharmaraja Yudhishthira looked at Kunti's son Arjuna. On seeing his brother, Arjuna said to Matsyaraja in this manner - 'O King! I accept your daughter as my daughter-in-law. This relationship between Matsya and Bharata clan is absolutely appropriate'. ॥ 35-36॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि उत्तराविवाहप्रस्तावे एकसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें उत्तराविवाहप्रस्तावविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥