श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  4.7.d1 
वैशम्पायन उवाच
(ततस्तु ते पुण्यतमां शिवां शुभां
महर्षिगन्धर्वनिषेवितोदकाम्।
त्रिलोककान्तामवतीर्य जाह्नवी-
मृषींश्च देवांश्च पितॄनतर्पयन्॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! तत्पश्चात् पाण्डवों ने परम पवित्र, मंगलमय, मंगलमय स्वरूपा त्रिभुवनकामनी गंगा में, जिसका जल महर्षि और गन्धर्वगण सदैव पीते रहते हैं, उतरकर देवताओं, ऋषियों और पितरों को तर्पण किया।
 
Vaishampayanji says- Rajan! Thereafter, the Pandavas descended into the most holy, auspicious, auspicious form, Tribhuvankamaniya Ganga, whose waters are always consumed by the Maharshi and the Gandharvas, and offered oblations to the gods, sages and ancestors.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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