श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  4.7.2-3 
नराधिपो राष्ट्रपतिं यशस्विनं
महायशा: कौरववंशवर्धन:।
महानुभावो नरराजसत्कृतो
दुरासदस्तीक्ष्णविषो यथोरग:॥ २॥
बलेन रूपेण नरर्षभो महा-
नपूर्वरूपेण यथामरस्तथा।
महाभ्रजालैरिव संवृतो रवि-
र्यथानलो भस्मवृतश्च वीर्यवान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वे अत्यंत यशस्वी और मत्स्य राष्ट्र के अधिपति थे । राजा युधिष्ठिर भी अत्यंत यशस्वी, कौरव वंश की गरिमा बढ़ाने वाले और महापुरुष (अत्यंत प्रभावशाली) थे । समस्त राजा-महाराजा उनका सम्मान करते थे । वे तीक्ष्ण विष वाले सर्प के समान भयंकर थे । बल और रूप की दृष्टि से वे मनुष्यों में श्रेष्ठ और महान थे । अपने अद्वितीय रूप के कारण वे देवता के समान प्रतीत होते थे । जैसे विशाल बादलों से ढका हुआ सूर्य और राख में छिपी हुई अग्नि, वैसे ही उनका तेजस्वी रूप वेश-भूषा से आच्छादित था । वे अत्यंत वीर थे । 2-3॥
 
He was very famous and the ruler of Matsya Rashtra. King Yudhishthir was also very famous, enhanced the dignity of the Kaurava dynasty and was a great man (extremely influential). All the kings and emperors honored him. He was as fierce as a snake with sharp venom. In terms of strength and form, he was the best and greatest among humans. Due to his unique appearance he looked like a god. Like the sun covered with huge clouds and fire hidden in ashes, his stunning form was covered with costumes. He was very brave. 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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