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श्लोक 4.67.4-d1  |
ऊचु: प्रणम्य सम्भ्रान्ता: पार्थ किं करवाम ते॥ ४॥
(प्राणानन्तर्मनोयातान् प्रयाचिष्यामहे वयम्।
वयं चार्जुन ते दासा ह्यनुरक्ष्या ह्यनायका:॥ |
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| अनुवाद |
| उन सबने अर्जुन को प्रणाम किया और भयभीत स्वर में कहा- 'कुन्तीपुत्र! हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं? अर्जुन! हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमारे हृदय में छिपे हुए प्राणों की रक्षा करें। हम आपके दास और अनाथ हैं; अतः आप सदैव हमारी रक्षा करें।'॥ 4॥ |
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| All of them bowed before Arjuna and said in a frightened tone- 'Kunti's son! What service can we offer you? Arjuna! We request you to protect our lives which are hidden within our hearts. We are your servants and orphans; hence you should always protect us.'॥ 4॥ |
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