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श्लोक 4.63.14  |
एवं सर्वाणि सैन्यानि भग्नानि भरतर्षभ।
व्यद्रवन्त दिश: सर्वा निराशानि स्वजीविते॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| हे भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार समस्त सेना की व्यूह रचना छिन्न-भिन्न हो गई। सभी सैनिक प्राणों से निराश होकर सब दिशाओं में भागने लगे॥14॥ |
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| O great Bharata, Janamejaya! Thus the entire army's formation was broken. All the soldiers, despairing of their lives, began to run in all directions.॥ 14॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे अर्जुनसंकुलयुद्धे त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके समय अर्जुनका संकुलयुद्धविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥
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