श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 63: अर्जुनपर समस्त कौरवपक्षीय महारथियोंका आक्रमण और सबका युद्धभूमिसे पीठ दिखाकर भागना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  4.63.1-2 
वैशम्पायन उवाच
ततो दुर्योधन: कर्णो दु:शासनविविंशती।
द्रोणश्च सह पुत्रेण कृपश्चापि महारथ:॥ १॥
पुनर्ययुश्च संरब्धा धनंजयजिघांसव:।
विस्फारयन्तश्चापानि बलवन्ति दृढानि च॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात दुर्योधन, कर्ण, दु:शासन, विविंशति, आचार्य द्रोण, उनके पुत्र तथा महारथी कृपाचार्य - ये सभी योद्धा क्रोध में भरकर धनंजय को मारने की इच्छा से अपने प्रबल एवं मजबूत धनुषों की ध्वनि फैलाते हुए उस पर पुनः आक्रमण करने लगे। 1-2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Duryodhana, Karna, Dushasana, Vivinshati, Acharya Drona with his son and the great warrior Kripacharya - all these warriors, filled with rage and desirous of killing Dhananjay, attacked him again, spreading the sound of their strong and strong bows. 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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