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mahabharat 4.58.8: क्षमा, इन्द्रिय-संयम, सत्य, मृदुता, सरलता और अन्य अनेक सद्गुण इन विप्रशिरोमणियों में सदैव विद्यमान रहते हैं ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 4.58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.58.8 
क्षमा दमश्च सत्यं च आनृशंस्यमथार्जवम्।
एते चान्ये च बहवो यस्मिन् नित्यं द्विजे गुणा:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
क्षमा, इन्द्रिय-संयम, सत्य, मृदुता, सरलता और अन्य अनेक सद्गुण इन विप्रशिरोमणियों में सदैव विद्यमान रहते हैं ॥8॥
 
Forgiveness, sensual control, truth, softness, simplicity and many other virtues are always present in these Viprashiromanis. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)