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स तु लब्ध्वान्तरं तूर्णमपायाज्जवनैर्हयै:।
छिन्नवर्मध्वज: शूरो निकृत्त: परमेषुभि:॥ ७६॥
अनुवाद
अर्जुन के उत्तम बाणों से द्रोणाचार्य का कवच और ध्वज छिन्न-भिन्न हो गए थे। वे स्वयं भी बुरी तरह घायल हो गए थे, अतः अवसर पाते ही वे अपने वेगवान घोड़ों पर सवार होकर तुरन्त वहाँ से भाग निकले।
Drona's armour and flag had been shattered by Arjuna's excellent arrows. He himself was badly injured, so as soon as he got the chance, he immediately fled from there riding his fast horses.
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि द्रोणापयाने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें द्रोणाचार्यके पलायनसे सम्बन्ध
रखनेवाला अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥